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भारतीय सेना की महिला अफसरों को परमानेंट कमीशन, पूरी मानी जाएगी न्यूनतम 20 साल की अर्हता सेवा

सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया अहम् फैसला

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत मिले अधिकार का इस्तेमाल करते हुए, महिलाओं अधिकारियों को मिले स्थायी कमीशन को बरकरार रखने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा। सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले में कहा कि वे महिला अधिकारी एसएससीओएस और हस्तक्षेपकर्ता, जिन्हें कार्यवाही के दौरान किसी भी स्तर पर सेवा से हटा दिया गया था, उन्हें यह माना जाएगा कि उन्होंने 20 साल की अपनी सेवा पूरी कर ली है और वे पेंशन के हकदार होंगी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उन्हें वेतन का बकाया नही मिलेगा।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस उज्ज्वल भुयान और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने फैसला सुनाया कि अधिकारियों को पेंशन के लिए जरूरी न्यूनतम 20 साल की अर्हता सेवा पूरी कर ली गई मानी जाएगी, भले ही उन्हें सर्विस से पहले मुक्त कर दिया गया हो। बता दें कि यह निर्णय विंग कमांडर सुचेता एडन और अन्य की तरफ से दायर याचिकाओं समेत कई याचिकाओं पर आया है, जिनमें 2019 में पॉलिसी चेंज और पिछले सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) के निर्णयों के आधार पर स्थायी कमीशन से इनकार को चैलेंज दिया गया था।

निर्णय के अहम अंशों को पढ़ते हुए, सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि महिला अफसरों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट अक्सर इस धारणा के अंतर्गत लापरवाही से ग्रेड की जाती थी कि वे करियर में प्रगति या स्थायी कमीशन के लिए पात्र नहीं होंगी। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने कहा कि वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट को इस धारणा के साथ लिखा गया था कि उनको करियर में प्रगति नहीं मिलेगी। इससे उनकी ओवरऑल मेरिट पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। बेंच ने थल सेना, वायु सेना और नौसेना की एसएससी महिला अधिकारियों को पीसी से वंचित किए जाने के केस पर अलग से विचार किया।

Author Desk

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