‘मैं अकेला रह लूंगा’ इस अहंकार को दूर रखें, आप पृथ्वी से बाहर नहीं रह सकते और पत्थरों से पेट नहीं भर सकते : साध्वी शुभंकरा श्रीजी

रायपुर। एमजी रोड स्थित जैन दादाबाड़ी प्रांगण में चल रहे मनोहरमय चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला में नवकार जपेश्वरी साध्वी शुभंकरा श्रीजी ने कहा कि आज हम बहुत हड़बड़ी में जीवन जी रहे हैं, किसी काम में कहीं थोड़ी सी देर हो जाए तो हम क्रोध से आग बबूला हो जाते हैं। इसके साथ ही हम अलाल भी बन चुके हैं। हम नियमित योग भी नहीं करते हैं, जबकि योग से कई सारी बीमारी शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाती है और यह क्रोध भी कहीं गायब हो जाता है।
साध्वीजी कहती है कि हमें मंत्रों के उच्चारण के दौरान पूर्णविराम और अल्पविराम जैसे सभी चिन्हों का पालन करना चाहिए। समय की कमी की वजह से हमें इतनी जल्दी रहती है कि हम मंत्रों को सिर्फ रटते जाते हैं। मंत्रों का जाप करते समय हमें उनके अर्थ को भी समझना है और मंत्र के साथ-साथ उनका अर्थ भी दिमाग में चलते रहना चाहिए। मन, वचन और काया की एकाग्रता यानी प्रेजेंस ऑफ माइंड के साथ हमें पूजन अनुष्ठान में बैठना चाहिए। परमात्मा की भक्ति में हमें ऐसे लीन होना है कि आजू-बाजू कोई भी आएं हमें कोई मतलब ना रहे, पर होता उल्टा है। जबकि नोट गिनने समय और टीवी देखते समय आपके बाजू में कोई आ जाए, बाजा बजने लगे या किसी का फोन भी आ जाए तो आपको फर्क नहीं पड़ता। अब आप सोचिए कि आप परमात्मा से कितने दूर है और ऐसा कर आप बहुत गहरे कर्म बांध रहे है। साध्वीजी कहती है कि परमात्मा के दर्शन करने के बाद मंदिर से बाहर निकलते समय हमारी पीठ परमात्मा की ओर नहीं होनी चाहिए। मंदिर में कई लोग दर्शन करने के बाद मंदिर के प्रांगण में बैठते है, क्या आपको पता है कि वे ऐसा क्यों करते है क्योंकि उन्हें ऐसा करने में शांति मिलती है। भगवान के दर्शन करने के बाद प्रांगण में बैठ कर आप प्रभु की अनुभूति कर सकते है और यह कह सकते है कि हे परमात्मा मैं आपसे मिलने दोबारा आऊंगा।
साध्वीजी कहती है कि हमारे शरीर की संरचना मां के गर्भ में ही बन जाती है। सभी लोग रंग-रूप से अलग होते हैं, कद-काठी से भी अलग हो सकते हैं। यह निर्माण उनके पिछले भव के भावों अनुसार होता है। हमें अपने जीवन का स्ट्रक्चर सुधारना है और जीवन निर्माण का स्ट्रक्चर है, भाव। जीवन में व्यक्ति अपने अनुसार क्रिया करता है। वह कहता है कि मुझे किसी की आवश्यकता नहीं है, मैं अकेले रह लूंगा यह उसका अहंकार है। क्योंकि यहां छत भी पृथ्वी की दी हुई संरचना है। आप भोजन भी कच्चा नहीं खा सकते, उसे उबालना होगा, पकाना होगा और उसके लिए अग्नि चाहिए जो ईंधन से प्राप्त होगी। हमारा जीवन पराश्रित है, बिना ऑक्सीजन के हम जीवन नहीं जी सकते है। हम अभी इस वक्त जो ऑक्सीजन ले रहे हैं, वह बिल्कुल ही मुफ्त है। इसके लिए हमें कोई पैसे नहीं देने पड़ते ना ही कोई पारिश्रमिक करनी पड़ती है लेकिन जब हम बीमार पड़ जाएंगे और हमें हॉस्पिटल जाना पड़ेगा तो इस ऑक्सीजन की कीमत भी आपको चुकानी पड़ेगी। वैसे ही जो अनाज और फल आप खा रहे हैं वह भी वनस्पति के प्रारूप है। आप इन सभी का उपयोग कर रहे हो और आप कहते हो कि मैं अकेले रह लूंगा। यह बिल्कुल भी संभव नहीं है। यह आपका अहंकार है समय रहते और अपनों को खोने से पहले इसे दूर कर लीजिए, नहीं तो आपको बहुत पछताना पड़ेगा।



