कड़वी दवाओं की तरह अपनी बुरी आदतों को गटक जाओ, नहीं तो जीवनभर आपका मन अशांत रहेगा : साध्वी शुभंकरा श्रीजी

रायपुर। एमजी रोड स्थित जैन दादाबाड़ी प्रांगण में चल रहे मनोहरमय चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला में पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व की पंचम प्रभात पर कल्पसूत्र का अध्ययन करते हुए साध्वी शुभंकरा श्रीजी ने आदिनाथ भगवान के जीवन की व्याख्या सुनाई। केवल ज्ञान के बारे में बताते हुए उन्होंने भगवान नेमिनाथ के परिवार, उनके मोक्ष से लेकर निर्वाण पद की प्राप्ति तक का प्रसंग बताया और साथ ही 24 तीर्थंकरों के बीच के अंतरकाल की व्याख्या की।
साध्वीजी ने आगे कहा कि जब आपको कोई बीमारी हो जाए तो डॉक्टर कड़वी दवाई लिख कर देता है। इन कड़वी दवाइयां को कभी कोई चबाकर नहीं खाता, इन्हें सीधे गटकना होता है। छोटी-मोटी समस्याओं के लिए कभी डॉक्टर चॉकलेट जैसी दवाइयां दे देता है जिसे हम चुस कर खा लेते हैं पर कड़वी दवाइयां के साथ ऐसा नहीं होता। कड़वी दवाइयां खाने से मुंह कड़वा हो जाता है और यह कड़वाहट बहुत देर तक बने रहती है। वैसे ही अगर आप बादाम खा रहे हो और एक कड़वा बादाम आपके मुंह में चला जाए तो बाकी बदाम भी आपको कड़वे लगने लगेंगे। ठीक वैसे ही हमें जीवन में कड़वाहट का एहसास होता रहता है जैसे कि अपमान, ईर्ष्या का भाव, मन में कोई बात रख लेना अगर इन्हें एक बार में गटक लिया जाए तो यह खत्म हो जाएगी और इन्हें आपने स्वाद बनाकर जीवन में रखा तो यह आपको जीवनभर कड़वाहट का अहसास दिलाती रहेगी। इस कड़वाहट को अगर हम ध्यान में रखें तो जिसमें हमें शांति के साथ समय बिताना था वह आशांत हो जाएगा और हमारे काम भी नहीं कर पाएंगे। कल्प सूत्र भी यही कहता है कि इन्हें नजरअंदाज करो, जिन्होंने इसे नजर अंदाज किया उनका जीवन बन गया और जो नहीं कर पाया वह भव भ्रमण में ही जुटा रहेगा।
साध्वीजी कहती है कि आज आप देखेंगे तो पहले के पहनावे और आज के पहनावे में जमीन-आसमान का अंतर है। पहले सभी लोग बहुत ही साधारण और सोबर कपड़े पहनते थे लेकिन अब हर दिन के लिए, हर कार्यक्रम के लिए, सुबह से लेकर रात तक लोग अलग-अलग कपड़े पहनते है। शादी-पार्टियों के लिए अलग ड्रेस, मंदिर जाने के लिए और पूजन-अनुष्ठान के लिए अलग कपड़े लोग पहन रहे है। हमें भारतीय संस्कृति के अनुसार कपड़े पहनने चाहिए। लोग आज वेस्टर्न कल्चर अपना रहे है। यह अच्छा नहीं लगता है, हम बार-बार आपको टोकते है तो कोई कारण जरूर होता है, आपको ऐसा नहीं करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि एक बार ही नहीं हर बार, चातुर्मास में हर साल आपके नगर में कोई न कोई साधु-साध्वी आपके नगर में आएंगें। सभी के उदाहरण अलग-अगल जरूर हो सकते है पर सार सभी का एक ही होता है । हम हर साल प्रवचन सुनने आते है और पंडाल से बाहर जाते ही सब भूल जाते है। हमें अपना जीवन बनाने के लिए प्रवचन सुनना है। ऐसा बिल्कुल मत करना कि एक कान से सुना और दूसरे से निकाल दिया। हालांकि यह सब बोलने की बातें होती है कि सुना और निकाल दिया लेकिन ऐसा कभी होता नहीं है, आपने कभी किसी बात को सुना तो वह वाक्य आपके दिमाग में जाकर स्टोर हो जाता है। याद तो वह हमेशा रहता है लेकिन यह हम पर निर्भर करता है कि किन बातों को हमें प्राथमिकता देना है।
उन्होंने आगे कहा कि हमसे कोई भी गलती हो जाए तो रात को ही हमें उसका प्रायश्चित कर लेना चाहिए। बिना प्रायश्चित करे हमें नहीं सोना चाहिए। एक बार रात को सोने से पहले यह जरूर सोचना चाहिए कि आज हमने किसका अपमान किया है। जिसके साथ भी आप कुछ बुरा करते है तो उसे बोलकर, उससे माफी मांगकर सोना चाहिए। गुस्से में कब क्या हो जाता है, पता नहीं लेकिन ऐसा करने के कितने गहरे कर्म बंध जाते है आप कभी समझ नहीं पाओगे। ऐसे कर्मों का फल आपके सामने किसी भयावह घटना के रूप में आएगा और तब उसका सामना आपको करना होगा। समय रहते ही आप लोगों से माफी लीजिए क्योंकि किसी भी बात को असमय कहने का कोई मतलब नहीं होता, ऐसा करके केवल आप अपना समय बर्बाद करोगे।



