साहित्य

दहलीज़ पर खड़ा समय : 2025 से 2026 तक

दहलीज़ पर खड़ा समय : 2025 से 2026 तक

डॉ. संध्या बिसेन, आईएसबीएम विश्वविद्यालय, छुरा

2025 की विदाई, 2026 का स्वागत

यहाँ 2025 की विदाई और 2026 के आगमन पर एक विस्तृत और मौलिक (original) कविता प्रस्तुत है। कविता एक “महाकाव्य” या लंबी रचना (Long-form poetry) जैसी होती है, इसलिए मैंने इसे एक प्रवाह में पिरोया है, जो बीते साल के हर अहसास और आने वाले साल की नई उम्मीदों को समेटे हु!

 

शीर्षक: “दहलीज़ पर खड़ा समय: 2025 से 2026 तक”

(खंड 1: विदाई की शाम – 2025 का आखिरी सलाम)

देखो, पश्चिम के क्षितिज पर, सूरज की वो आखिरी लालिमा अब मद्धम पड़ रही है, जैसे कोई पुराना दोस्त, अपना बस्ता समेट रहा हो। कैलेंडर के पन्नों पर सिमटा हुआ यह साल, अब सिर्फ तारीखों का ढेर नहीं, बल्कि यादों का एक समंदर है।

2025, तुम जब आए थे, तो उम्मीदें नई थीं, बिलकुल वैसे ही, जैसे आज 2026 के लिए हैं। मगर अब, जब तुम जा रहे हो, तो लग रहा है जैसे घर का कोई सदस्य विदा ले रहा हो। तुम्हारे दामन में हमारी कितनी ही हंसी, कितने ही आंसू, और अनगिनत खामोशियां कैद हैं।

याद है वो जनवरी की ठिठुरती रातें? जब हमने नए वादे किए थे खुद से, कुछ पूरे हुए, कुछ अब भी अधूरे ख्वाब बनकर, अगले साल के सूटकेस में शिफ्ट हो गए हैं। तुमने हमें सिखाया कि समय रुकता नहीं, चाहे जीत हो या हार, पहिया घूमता रहता है।

हमने इस साल में क्या नहीं देखा? कभी धूप की तपिश ने इम्तिहान लिया, तो कभी बारिश की बूंदों ने रूह को भिगोया। कुछ अपने हमसे दूर हो गए, सितारों में जा बसे, उनकी यादें 2025 की डायरी में ‘बुकमार्क’ बन गई हैं। और कुछ नए चेहरे मिले, जो अब दिल के करीब हैं, ये रिश्ते, ये नाते, तुम्हारी ही तो देन हैं।

(आत्ममंथन – क्या खोया, क्या पाया)

अलविदा कहते हुए, ज़रा रुक कर सोचता हूँ, क्या मैं वही हूँ, जो साल की शुरुआत में था? शायद नहीं। वक्त ने मेरे चेहरे पर भले ही लकीरें न बढ़ाई हों, मगर रूह पर तजुर्बों की परतें ज़रूर चढ़ाई हैं।

2025, तुमने मुझे सब्र सिखाया, जब दौड़ते-भागते शहरों में सांस फूलने लगी, तो तुमने ही कहा—”रुको, सांस लो, जीवन अभी बाकी है।” तुम्हारे बारह महीनों ने मुझे बारह तरह के पाठ पढ़ाए। कभी गिरकर संभलना, तो कभी संभलकर भी फिसल जाना, ये सारी ठोकरें अब 2026 की सीढ़ियां बनेंगी।

तुम्हारी विदाई में कोई गिला नहीं है, हाँ, थोड़ा भारीपन ज़रूर है सीने में। वो पुरानी आदतें, वो आलस की दोपहरें, वो गलतियां, जिनसे मैंने बहुत कुछ सीखा, मैं उन सबको पोटली में बांधकर, तुम्हारे साथ ही छोड़ रहा हूँ। मैं नहीं चाहता कि मेरे आने वाले कल पर, मेरे बीते हुए कल की परछाई भी पड़े।

( मध्यरात्रि का सन्नाटा – बदलाव का पल)

अब घड़ी की सुइयां धीरे-धीरे ऊपर की ओर सरक रही हैं, टिक-टॉक… टिक-टॉक… ये आवाज़ नहीं, समय के दिल की धड़कन है। 31 दिसंबर की यह रात, एक पुल (Bridge) की तरह है, जिसके एक तरफ यादों का शोर है, और दूसरी तरफ भविष्य का रहस्यमयी सन्नाटा।

दुनिया जश्न मना रही है, पटाखे सज रहे हैं, मगर शोर के बीच, एक खामोश प्रार्थना भी है। हर दिल में एक ही दुआ है— “कि आने वाला वक्त, बीते हुए वक्त से बेहतर हो।” सड़कों पर रौशनी है, चेहरों पर मुस्कान है, मगर आँखों में एक अनजाना सा डर और उम्मीद दोनों हैं। क्या 2026 हमारी झोली में खुशियां भरेगा? या फिर नई चुनौतियां लेकर दरवाजे पर दस्तक देगा?

ये जो चंद मिनट बचे हैं, ये साल के सबसे कीमती मिनट हैं। इनमें हम माफ़ कर सकते हैं उन्हें, जिन्होंने दिल दुखाया, इनमें हम धन्यवाद दे सकते हैं उन्हें, जिन्होंने साथ निभाया। चलो, इस आखिरी पहर में, सारे गिले-शिकवे इसी साल की राख में मिला दें।

( आगमन – 2026 का प्रवेश)

और… लो! घड़ी ने बारह बजा दिए। कैलेंडर बदल गया, तारीख बदल गई, एक नया अंक, एक नया साल—2026!

स्वागत है तुम्हारा, ओ नए मुसाफिर! तुम्हारी पहली सुबह की पहली किरण, जैसे कोरे कागज़ पर सुनहरी स्याही जैसी है। तुम्हारे आने से हवाओं में एक ताज़गी है, जैसे प्रकृति ने भी पुरानी चादर उतार फेंकी हो।

2026, तुम सिर्फ़ एक नंबर नहीं हो, तुम 365 कोरे पन्ने हो, जिस पर हम अपनी किस्मत लिखेंगे। तुम एक वादा हो, कि सुधार की गुंजाइश अभी बाकी है। तुम एक मौका हो, उन सपनों को जीने का, जो 2025 की आपाधापी में कहीं दब गए थे।

मैं तुम्हारा स्वागत बाहें फैलाकर करती हूँ, डर कर नहीं, बल्कि एक योद्धा की तरह। क्योंकि मैं जानती हूँ, तुम अपने साथ चुनौतियां लाओगे, मगर मेरे पास अब पिछले साल का तजुर्बा है।

2025 की विदाई, 2026 का स्वागत

(मध्यरात्रि का सन्नाटा – बदलाव का पल)

अब घड़ी की सुइयां धीरे-धीरे ऊपर की ओर सरक रही हैं, टिक-टॉक… टिक-टॉक… ये आवाज़ नहीं, समय के दिल की धड़कन है। 31 दिसंबर की यह रात, एक पुल (Bridge) की तरह है, जिसके एक तरफ यादों का शोर है, और दूसरी तरफ भविष्य का रहस्यमयी सन्नाटा।

दुनिया जश्न मना रही है, पटाखे सज रहे हैं, मगर शोर के बीच, एक खामोश प्रार्थना भी है। हर दिल में एक ही दुआ है— “कि आने वाला वक्त, बीते हुए वक्त से बेहतर हो।” सड़कों पर रौशनी है, चेहरों पर मुस्कान है, मगर आँखों में एक अनजाना सा डर और उम्मीद दोनों हैं। क्या 2026 हमारी झोली में खुशियां भरेगा? या फिर नई चुनौतियां लेकर दरवाजे पर दस्तक देगा?

ये जो चंद मिनट बचे हैं, ये साल के सबसे कीमती मिनट हैं। इनमें हम माफ़ कर सकते हैं उन्हें, जिन्होंने दिल दुखाया,

( संकल्प और प्रार्थना – भविष्य की ओर)

ए 2026! मेरी तुमसे कुछ अर्ज़ियां हैं। इस साल, दुनिया में थोड़ी नफरत कम करना, सरहदों पर शांति रखना, और दिलों में प्यार भरना। गरीब की थाली खाली न रहे, और किसी की छत, बारिश में न टपके।

मैं खुद से भी वादा करता हूँ, कि इस नए साल में, मैं “मैं” से ज्यादा “हम” पर सोचूँगी। स्क्रीन की दुनिया से बाहर निकलकर, असली रिश्तों को वक्त दूंगी। पेड़ लगाऊंगी, पानी बचाऊंगी, सिर्फ़ तारीखें नहीं बदलूंगी बल्कि खुद को बदलूंगी।

तुम्हारी एंट्री धमाकेदार है, आतिशबाजी से आसमान रंगीन है। मगर असली रौशनी तो तब होगी, जब हम किसी के अंधेरे जीवन में दीपक जला पाएंगे।

(निरंतरता का गीत)

तो चलो, 2025 को एक प्यारा सा “अलविदा” कहें, बिना किसी मलाल के, बिना किसी खेद के। उसने अपना काम बखूबी किया, अब उसे विश्राम करने दो इतिहास के पन्नों में।

और 2026… आओ, मेरा हाथ थामो। सफर लंबा है, रास्ते अनजान हैं, मगर हौसले चट्टान हैं। हम चलेंगे, गिरेंगे, उठेंगे और फिर चलेंगे। क्योंकि रुकना मना है, और चलना ही ज़िंदगी है।

अलविदा 2025, तुम्हारी यादें अमर रहेंगी। स्वागत 2026, तुम्हारी कहानी अब शुरू होती है।

नया साल, नया जोश, नई उमंग, मुबारक हो सबको यह नया रंग!

Author Desk

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