राजधानी में सजी गुजरात की लोक संस्कृति की छटा, ‘डायरो’ आयोजन में उमड़ा जनसैलाब

सर्व गुजराती समाज के पदाधिकारी और हजारों समाजजन रहे उपस्थित
रायपुर(प्रखर)राजधानी रायपुर में गुजरात की समृद्ध लोक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत करते हुए प्रसिद्ध लोक कला ‘डायरो’ का भव्य आयोजन किया गया। एनआर गुजराती फाउंडेशन गांधीनगर, छत्तीसगढ़ सर्व गुजराती समाज एवं एनआर गुजराती एसोसिएशन के संयुक्त तत्वावधान में 8 फरवरी को आयोजित यह कार्यक्रम राजधानी के गुजराती स्कूल परिसर में संपन्न हुआ। आयोजन में समाज के पदाधिकारी, जनप्रतिनिधि एवं बड़ी संख्या में समाजजन शामिल हुए।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में सांसद बृजमोहन अग्रवाल, विधायक राजेश मूणत, पुरंदर मिश्रा, सुनील सोनी तथा ओडिशा के विधायक जय राजेंद्र डोलकिया उपस्थित रहे। अतिथियों का पारंपरिक तरीके से स्वागत किया गया। स्वागत भाषण पूर्व विधायक देवजी भाई पटेल ने दिया।
सर्व गुजराती समाज के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतिश गांधी ने अपने संबोधन में समाज द्वारा देश के आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास में निभाई जा रही भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करते हैं और समाज में एकता एवं समरसता को मजबूत बनाते हैं।
कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण गुजरात के सुप्रसिद्ध लोक कलाकार डॉ. रंजीत वांक रहे, जिन्होंने ‘डायरो’ की प्रस्तुति के माध्यम से गुजरात के शूरवीरों की गाथाएं, लोककथाएं और सांस्कृतिक प्रसंगों को अत्यंत प्रभावशाली अंदाज में प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुति ने उपस्थित जनसमूह को भावविभोर कर दिया। भक्ति, संस्कृति, परंपरा और प्राचीन शौर्य गाथाओं से ओतप्रोत कार्यक्रम ने पूरे परिसर को गुजरातमय बना दिया।
इस अवसर पर समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान देने वाले 100 से अधिक सामाजिक बंधुओं को मोमेंटो एवं अंगवस्त्र भेंट कर सम्मानित किया गया। आयोजन में प्रदेश के विभिन्न स्थानों—जगदलपुर, बिलासपुर, महासमुंद, धमतरी, बालोद, राजनांदगांव, दुर्ग, भिलाई, कांकेर, रायगढ़, भाटापारा, अंबिकापुर, रायपुर, कोरबा, मनेंद्रगढ़ और खरोरा—से 2000 से अधिक समाजजन शामिल हुए।
पूरे आयोजन के दौरान अनुशासन, व्यवस्थापन और सांस्कृतिक गरिमा का विशेष ध्यान रखा गया। समाज के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की सक्रिय भूमिका से कार्यक्रम अत्यंत सफल रहा।
इस भव्य ‘डायरो’ आयोजन ने न केवल राजधानी में गुजरात की लोक कला को नई पहचान दी, बल्कि समाज की एकजुटता, सांस्कृतिक प्रतिबद्धता और सामाजिक सक्रियता का भी सशक्त संदेश दिया।



