छत्तीसगढ़

आज शब्दों का बदल रहा है अर्थ, शब्द कुछ और, क्रिया कुछ और, हमें संभालना होगा : साध्वी शुभंकरा श्रीजी

रायपुर। एमजी रोड स्थित जैन दादाबाड़ी प्रांगण में चल रहे मनोहरमय चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला में शनिवार को नवकार जपेश्वरी साध्वी शुभंकरा श्रीजी ने कहा कि आप जैसे जैसे वर्षों में पीछे चलते जाएंगे तो आपको उस समय के खानपान में एक अलग ही क्वालिटी देखने को मिलेगी। आप जितना पीछे जाएंगे क्वालिटी उतनी ही बढ़ती जाएगी और आज हम जितना आगे बढ़ रहे हैं खाने की क्वालिटी उतनी ही गिरती जा रही है। अब शायद ही ऐसा कोई खाद्य पदार्थ बचा हो जिसमें कि मिलावट ना होता हो। पहले के लोग बहुत ही लंबा जीवन जीते थे क्योंकि उस समय उन्हें सब ओरिजिनल खाने पीने की चीजें मिलती थी और वे सारी चीजें खाते थे। आज तो जितने माथे उतने चमके मतलब घर में जितने लोग उतनी ही अलग उनकी चॉइस सब लोग आज अपने पसंद का खाना अपनी मनपसंद की सब्जी ही खाते हैं।

प्रसन्नता के साथ भोजन करें ग्रहण

साध्वीजी कहती है कि आपको आसक्ति के साथ भोजन नहीं करना है प्रसन्नता के साथ आहार ग्रहण करना है। उतना ही भोजन करो जितना आपके शरीर के अंगों के लिए सुपाच्य हो। आज आप अन्नपूर्णा देवी का अपमान करोगे खाना नहीं खाओगे, खाना खाने में विकल्प चुनोगे, परोसा हुआ खाना नहीं खाओगे तो उसका प्रभाव शत प्रतिशत आपके शरीर में पड़ेगा।

पहले के घरों में आप देखोगे तो घर गोबर से लीपे हुए होते थे, पानी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता था और मार्बल केवल मंदिरों में ही लगाए जाते थे। आज आपके घरों के हालात ऐसे हो चुके हैं कि कोई संत आपके घर में रह नहीं सकता और वैसे ही आप भी उपाश्रय में ज्यादा देते हैं। दोनों में अंतर है। मार्बल का शाब्दिक अर्थ है बल को मारना। यह मार्बल आप के बल को मारता जा रहा है। आप धीरे-धीरे आधुनिकता की ओर बढ़ते जा रहे हैं, मशीनों से घिरते जा रहे हैं और आपका बल भी खत्म होता जा रहा है। आज तो घरों में जगह ही नहीं बची है, जहां देखो वहां सामान बिखरा पड़ा है। पहले लोग जमीन पर बैठकर चूल्हे में खाना बनाया करते थे। अगर आप भी आज वैसा करेंगे तो आपको पैसे देकर जिम और योगा क्लासेस जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

मार्बल ठंड में ठंडी हो जाती है और गर्मी में गर्म। आप अगर ठंडे फर्श पर खड़े होकर खाना बनाते हैं तो आप खुद ही घर में नेगेटिव उर्जा का संचार कर रहे हैं। वैसे ही आज लोग घर के अंदर चप्पल पहन कर घूमते हैं। हॉल के लिए अलग चप्पल, किचन के लिए अलग चप्पल, आंगन के लिए अलग चप्पल और बाथरूम के लिए अलग चप्पल। अगर आप चौकी में चप्पल पहन कर खाना बना रहे हो तो अन्नपूर्णा देवी नाराज होती है, पक्षी के पास चप्पल पहन कर जा रहे हो तो आपके इष्ट देव नाराज होंगे और हॉल में आप चप्पल पहन कर घूम रहे हैं तो माता लक्ष्मी आप से नाराज होंगी।

मृत्युभोज का बदला स्वरूप

साध्वीजी ने बताया कि आज लोगों ने मृत्युभोज का अर्थ ही बदल कर रख दिया है। मृत्युभोज पर आज तरह-तरह की टीका टिप्पणियां हो रही है और इसमें काफी हद तक सामाजिक बदलाव भी किया जा रहा है। मृत्यु भोज का असल स्वरूप पहले अलग था। गांव में गांव के सभी लोग एक साथ भोजन बनाते और शोक संतप्त परिवार को मृत्यु भोज कर कर उन्हें मिठाई खिलाते थे। गांव में शोक संतप्त परिवार को सबसे पहले भोजन कराया जाता था। आज तो मतलब ही पलट गया है, मृत्युभोज अपभ्रंश की ओर बढ़ चुका है। आज जिसके पास पैसा नहीं है, वह कर्जा लेकर मृत्युभोज करवा रहा है। हमें वापस लौटना होगा।

विचक्षण विद्यापीठ स्कूल के बच्चे पहुंचे दादाबाड़ी

आज वर्धमान नगर स्थित राजेंद्रनगर के विचक्षण जैन विद्यापीठ के 120 बच्चे धर्मनाथ जिनालय दादाबाड़ी पहुंचे। मनोहरमय चातुर्मास समिति के अध्यक्ष सुशील कोचर और महासचिव नवीन भंसाली ने बताया कि साध्वी वृंद के दर्शन वंदन के लिए आज यह बच्चे दादाबाड़ी पहुंचे। मनोहरमय चातुर्मास समिति और श्री ऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट के द्वारा उनका अभूतपूर्व अभिनंदन कर भोजन व्यवस्था प्रदान की गई। साथ ही शानदार उपहार पाकर बच्चो के चेहरे खिल उठे।

Author Desk

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