इन आठ दिनों अगर सच्चे मन से आराधना की है तो यह वर्षभर का शुद्धिकरण होगा: साध्वी शुभंकरा श्रीजी

रायपुर। पर्युषण पर्व जीवन शुद्धि का एक आध्यात्मिक शिविर होता है। इन आठ दिनों में हम अपने मन, वचन और काया को निर्मल करते हैं। अपनी चेतना को आध्यात्मिक दिशा देते हैं और धर्म के महान सिद्धांतों को जीवन में जीने की कोशिश करते हैं। इन आठ दिनों में अगर हम सच्चे मन से आराधना कर लेते हैं तो ये वर्ष भर का शुद्धिकरण कर सकते हैं। गलती किसी से भी हो सकती है, पर उसे स्वीकारना और सुधारना ही हमारे संस्कार होने चाहिए। जो गलती छिपाता है, वह कभी आगे नहीं बढ़ सकता, पर जो गलती मिटाना जानता है वह उन गलतियों से मुक्त हो जाता है। यह बातें एमजी रोड स्थित जैन दादाबाड़ी प्रांगण में चल रहे मनोहरमय चातुर्मास 2023 की प्रवचन श्रृंखला के दौरान पर्युषण पर्व के सातवें दिन नवकार जपेश्वरी साध्वी शुभंकरा श्रीजी ने कही।
उन्होंने आगे कहा कि किसी भी व्यक्ति के लिए वेश का परिवर्तन करके संत बनना सरल होता है, पर स्वभाव सुधारकर संत बनना जीवन की महान साधना है। केवल ड्रेस और एड्रेस बदलने से व्यक्ति को साधना का निर्मल परिणाम नहीं मिल सकता जब तक की वह अपना नेचर नहीं बदल लेता। दियासलाई दूसरों को जलाने के लिए जलती है पर दुसरा जले या न जले पर खुद को तो जलना ही पड़ता है। ऐसे ही हमारा क्रोध और कषाय है जो दूसरों के बजाय हमें ज्यादा दुखी करता है। कषाय से आत्मा का पतन होता है। हमारा अंतरमन उजाले के बजाय अंधेरे में जाता है। जैसे जानवर के गले में डोरी डालकर चाहे जिस दिशा में खींचा जा सकता है वैसे ही कषायों के पास में बंधा हुआ इंसान क्रोध, मान, माया में घिरा रहता है। उन्होंने कहा कि अहंकार के कषाय से बाहर निकलना चाहिए। दुनिया में सब कुछ करना सरल है पर सरल होना मुश्किल है।
साध्वीजी कहती है कि हो सकता है कि इस वर्ष हम कोई तीर्थयात्रा न कर पाए हों, पर इस पर्युषण में आप एक पुण्य जरूर कमा लीजिएगा। जिस किसी व्यक्ति से आपकी बोल-चाल बंद हो उसके घर की पाँच सीढिय़ाँ चढ़कर उसे गले लगाकर क्षमत-क्षमापना करके आ जाइएगा, आपको घर बैठे ही तीर्थ-यात्रा का पुण्य प्राप्त हो जाएगा। पर्युषण में हमें सबसे क्षमा मांगकर हमारे अन्तरहृदय को गंगा जैसा निर्मल और पावन करना है। उन्होंने कहा कि पर्युषण मन के प्रदूषण मिटाने का पर्व है। जैसे बाहर के कचरे और अंधेरे को हटाने के लिए दिवाली आती है, वैसे ही अंतर्मन के कषायों को मिटाने के लिए पर्युषण पर्व आता है। माना कि हम राग से मुक्त होकर वीतराग तो नहीं बन सकते, पर अपने मन के द्वेष को हटाकर वीतद्वेष तो बन ही सकते हैं।



