इंद्रियों का दासत्व छोड़ हमें उनका स्वामित्व प्राप्त करना है : साध्वी शुभंकरा श्रीजी

रायपुर। एमजी रोड स्थित जैन दादाबाड़ी प्रांगण में चल रहे मनोहरमय चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला में पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व की सप्तम प्रभात पर सोमवार को साध्वी शुभंकरा श्रीजी ने कहा कि हमें इंद्रियों का दासत्व छोड़ना है और उनका स्वामित्व प्राप्त करना है। दासत्व को स्वीकार करने वाला नौकर अपने मालिक के घर त्यौहार के दौरान भी एक से दो घंटा एक्स्ट्रा काम करता है। यह काम उसे करना ही पड़ता है क्योंकि उसने दासत्व को स्वीकार किया है। जॉब और नौकरी दोनों एक ही शब्द है, अंग्रेजी में इसे जॉब कहते है। इसे कहने में थोड़ा अच्छा तो जरूर लगता है लेकिन इसका हिंदी में शाब्दिक अर्थ नौकरी ही है। जब कभी आप ऑफिस जाने कुछ 5-10 मिनट देर हो जाए या 1 दिन नहीं जा पाए 2 दिन की छुट्टी ले ली या फिर आपकी तबीयत खराब हो जाती है तो आपके पैसे कट जाते हैं। अटेंडेंस लगाने के लिए आपको मैनेजर से अच्छे संबंध बनाने पड़ते हैं और अच्छे संबंध होने से वह मैनेजर आपकी छोटी-मोटी गलतियों को, 5-10 मिनट लेट होने या 1 दिन की छुट्टी लेने पर भी आपका अटेंडेंस लगा देता है। यह भी चोरी के समान है। जब तक आप दास रहेंगे तब तक आप को सुनना पड़ेगा और जैसे मालिक बोलेंगे वैसा करना पड़ेगा। आप जहां जॉब कर रहे हो वहां के मालिक आप कभी नहीं बन सकते हो। हमारी इंद्रियां भी हमसे दासत्व कराती है। आंख टिमटिमाती है और कान सतर्क रहते हैं। इन इंद्रियों को आप को रोक नहीं सकते हो, वास्तविकता यह है कि एक भी इंद्रियां हमारे वश में नहीं है।
साध्वीजी कहती है कि कई बार जो काम गुरु की उपस्थिति नहीं करा पाती है, वह काम गुरु के आशीर्वाद से ही हो जाता है। हर बार गुरु प्रत्यक्ष हो यह जरूरी नहीं है। गुरु पर आपकी आस्था होनी चाहिए। गुरु के प्रति आस्था, श्रद्धा और समर्पण नहीं हो, तो आपको आशीर्वाद भी नहीं मिल सकता है। आशीर्वाद के बिना जीवन में गुर का होना या नहीं होना एक बराबर है। गुरु का केवल ज्ञानवान होना आवश्यक नहीं है, गुरु के प्रति हमारे दिल में श्रद्धा का होना, आस्था का होना, समर्पण का होना आवश्यक है।
साध्वीजी कहती है कि अगर कुमार पाल राजा को गुरु नहीं मिले होते, तो 18 देशों में दया और प्रेम की बात नहीं हो सकती थी। आज तो यहां हमारा खुद के घर मे आधिपत्य नहीं है, किसी की अपने ही घर में नहीं चलती। आज की तारीख में कोई ऐसा बोल नहीं सकता कि मेरे घर में केवल मेरी ही चलती है और मेरे घरवाले मेरी बात मानते हैं। किसी के घर में किसी की नहीं चलती है। आपकी आपके घर में ही नहीं चलती और आप समाज, संस्था और व्यापार चलाने आते हो। फिर भी आप सोचते हो यहां मेरी ही चले। आपके पत्नी और आपके बच्चें भी आपके अनुसार नहीं चलते हैं। फिर सोचिए बाहर के लोग आपके हिसाब से कैसे चलेंगे। वहीं, 18 देशों के राजा, उनकी पुरे साम्राज्य में चलती थी। अपने घर में भी उन्हीं की चलती थी और बाहर में भी चलती थी। जो राजा कह दें, वह होता था और जिसे वे ना कह दे, वह चीज हरगिज नहीं होती थी। राजा अपने 11 लाख घोड़े और 84 हजार हाथियों को पानी छानकर पिलाने का आदेश देते थे, और वैसा ही किया जाता था। जबकि आप सोचिये आप अपना पानी भी छानकर नहीं पीते है। वहां लाखों घोड़ो और हाथियों को भी पानी छानकर पिलाया जाता था यहां हमारा खुद के ऊपर भी नियंत्रित नही है, तो हम कैसे दूसरों की बात कर सकते हैं।



