खरतरगच्छाचार्य पूर्णानंद सागर जी महाराज को आचार्य श्री से विभूषित किये जाने पर शहर मे हर्ष

धमतरी(प्रखर) दीर्घकाल तक जैन धर्म के तपो मार्ग को अपनाकर अध्यात्म की सेवा करने वाले खरतरगच्च्छाचार्य मज्जिन श्री पूर्णानंद सूरीश्वर जी म.सा.के 70 वे जन्मोत्सव के साथ ही आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित होने पर शहर सहित प्रदेश के जैन समाज में हर्ष व्याप्त है। गौरतलब है कि 26 नवंबर 1955 को शहर की धर्म धरा पर पूर्णानंद जी का जन्म हुआ शुरू से ही वे भगवान महावीर के सिद्धांतों को अपने में आत्मसात करते हुए त्याग और तपस्या के मार्ग पर चल पड़े थे और युवावस्था में ही साधुमार्गी धर्म को अंगीकार करते हुए आध्यात्मिक क्षेत्र में निकल पड़े ,इसे शहर के आध्यात्मिक इतिहास में और तब आगे चलकर चर्चा में आया जब बंगानी परिवार ने पूर्णानंद जी के साथ-साथ उनकी बहनों को भी आध्यात्मिक संयम मार्ग तथा भगवान महावीर स्वामी के बताए हुए अहिंसा के पथ पर चलने के लिए प्रेरित करते हुए वे भी पूरे भारत देश में धर्म के पालनार्थ पैदल विहार करने के लिए प्रेरित करते हुए वे भी निकल पडे। इसी तारतम्य में इन सभी का पिछले 3 वर्ष पूर्व चातुर्मास का सौभाग्य भी शहरवासियों को प्राप्त हुआ था। उस समय शहर की धर्म धरा से सभी साधुजनों ने मानव समुदाय से संयम जीवन को ही समग्र समस्याओं का समाधान बताते हुए परमात्मा महावीर के सिद्धांत के को ही विश्व कल्याण का सार्थक मार्ग बताते हुए अहिंसा परमो धर्म को अपनाने को रास्ता बताया था।
आचार्य प्रवर श्री की जन्म धरा राष्ट्र में बन गई आध्यात्मिक विशिष्ट पहचान
पूर्णानंद सागर महाराज जी के आचार्य प्रवर के आध्यात्मिक पद पर प्रविष्ट होने पर नगर निगम के पूर्व सभापति राजेंद्र शर्मा द्वारा उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हुए कहा है कि धमतरी की धारा ने धार्मिक क्षेत्र में अपनी पुरातन कालीन सांस्कृतिक विरासत के कारण अलग स्थान रखता है जिनमें पूर्णानंद सागर महाराज जी तथा उनके परिवार की तीन बहनें भी साधना, आराधना तथा जप एवं ताप के साथ संयम मार्ग पर चलते हुए भगवान महावीर के सिद्धांतों को जन-जन तक पहुंचा कर जो योगदान दिया है वह हम सब के लिए सौभाग्यशाली होते हुए क्षेत्र की विशिष्ट पहचान के रूप में स्वर्णिम अक्षरों में इतिहास में अंकित हो जाएगा।



