छत्तीसगढ़

अजीबोगरीब वेशभूषा वालों को शर्म नहीं आती पर देखने वालों की नजर झुक जाती है : साध्वी शुभंकरा श्रीजी

रायपुर। एमजी रोड स्थित जैन दादाबाड़ी प्रांगण में मनोहरमय चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला में बुधवार को नवकार जपेश्वरी साध्वी शुभंकरा श्रीजी ने कहा कि बेटे बहु का व्यवहार कैसा भी हो पर माता-पिता कभी दुराशिष नहीं देंगे। उनका दिल दुखाओगे तो भी वे आपको कुछ नहीं कहेंगे पर उसका प्रभाव आपके जीवन में देखने को मिलता है। कोई मां-बाप को बिना बताए ही प्लान बना कर घर से निकल जाते हैं और कुछ लोग बिना माता-पिता से पूछे बगैर कुछ काम नहीं करते हैं। यह माता पिता के लिए सुख दुख के पहलू के समान है।

साध्वीजी कहती है कि आज आपको एक घटना के बारे में बताते हैं। ज्यादा दिन पहले की बात नहीं है। एक व्यापारी के दुकान में आग लग जाती है और सारा माल जलकर खाक हो जाता है। व्यापारी बहुत परेशान रहता है और सोचता है कि अब कैसे होगा और क्या होगा मुझे घर चलाना है और व्यापार को फिर से खड़ा करना है। कुछ दिनों तक तो उसे नींद भी ढंग से नहीं आती थी। घटना के बाद उसकी पत्नी ने कहा कि आपको टेंशन लेने की जरूरत नहीं है। आप आराम से अपना काम करें, व्यापार को फिर से खड़ा करें और आने वाले 6 महीने तक टेंशन ना लें। पति ने पूछा ऐसा क्यों बोल रहे हो, तो पत्नी ने बताया कि मैंने कुछ पैसे जमा करके रखे हैं और उन पैसों से 6 महीने से ज्यादा घर खर्च चलाया जा सकता हैं। इसीलिए आप व्यापार को स्थापित करने के बारे में सोचें और उसी दिशा में काम करें।

मर्यादा की सीमा के अंदर रहो

साध्वीजी कहती है कि अपनी सीमाओं को लांघते जा रहे है, अजीबोगरीब वेशभूषा पहनकर जाने लगे हैं। इसका जिम्मेदार कौन है। इन सबके जिम्मेदार आप ही हो जो आपने अपने बच्चों को सिखाया नहीं कि धर्म स्थान पर कैसे कपड़े पहनने चाहिए। आजकल वेशभूषा है ऐसी हो गई है जो किसी के मन में विकार उत्पन्न कर सकती हैं। पहनने वालों को तो कोई शर्म नहीं आती पर देखने वालों की नजर झुक जाती है। आज किसी के घर भी जाओ तो यह समझ में नहीं आता बेटी कौन है, बहू कौन है, सास कौन है, सबने अजीबोगरीब वस्त्र धारण किया हुआ है। अगर घर में बड़े लोग सांस्कृतिक वेशभूषा पहने तो छोटों को भी वह भाव आता है। जबकि आज लड़कियां ऐसे कपड़े पहनने लगी है कि कब किस के मन में विकार आ जाए यह कहा नहीं जा सकता है। कब किसका मोहिनी कर्म का उदय हो जाए, कब कोई दुर्घटना हो जाए पता नहीं। आज तो विदेशों में भी लोग अपनी सभ्यता संस्कृति का पालन करने में जुट गए हैं। हमें भी यह सोचना होगा कि हम धर्म स्थान पर जाए तो हमारा सिर ढका हुआ होना चाहिए। यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि आज मंदिरों में लिखना पड़ रहा है कि मर्यादित कपड़े पहन कर मंदिर में प्रवेश करें। इन सब कार्य को का दुष्परिणाम भी आप देखने को मिलता है। इन्हें रोकने के लिए हमें अभी से ही संभालना होगा और हिना से बचने का प्रयास करना होगा।

Author Desk

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