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वंदे मातरम् बिल पर सियासत तेज, मुस्लिम संगठनों ने जताई आपत्ति

मुसलमान सिर्फ एक अल्लाह की इबादत करता है : मौलाना मदनी

नई दिल्ली। वंदे मातरम् बिल को संसद के दोनों सदनों से मंजूरी मिलने के बाद देश में राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। बिल को लेकर मुस्लिम संगठनों ने धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला देते हुए आपत्ति जताई है, जबकि समर्थकों का कहना है कि इसका उद्देश्य राष्ट्रीय गीत को सम्मान और कानूनी संरक्षण देना है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) और जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने बिल के कुछ प्रावधानों पर सवाल उठाए हैं। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि मुसलमानों को वंदे मातरम् पढऩे या गाने से आपत्ति नहीं है, लेकिन उनकी धार्मिक मान्यताओं के कुछ पहलू इसे स्वीकार करने की अनुमति नहीं देते।

मदनी ने कहा कि इस्लाम में केवल एक ईश्वर की इबादत की जाती है और किसी अन्य को इसमें शामिल नहीं किया जा सकता। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 25 में दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार और अनुच्छेद 19 में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को उसकी धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ किसी गीत, नारे या विचार को अपनाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

एआईएमपीएलबी की ओर से भी बयान जारी कर कहा गया कि वंदे मातरम् को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाना धार्मिक और संवैधानिक स्वतंत्रता के अधिकारों को प्रभावित कर सकता है। संगठन का कहना है कि किसी विशेष धार्मिक विचार या मान्यता को सभी नागरिकों पर लागू नहीं किया जाना चाहिए।

बिल में कानूनी संरक्षण का प्रावधान

वंदे मातरम् बिल 29 जुलाई को राज्यसभा और 30 जुलाई को लोकसभा से पारित हुआ है। अब इसे राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतजार है। प्रस्तावित प्रावधानों के अनुसार राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को राष्ट्रगान जन गण मन की तरह कानूनी सुरक्षा देने का प्रावधान है। बिल में वंदे मातरम् के अपमान, गायन में जानबूझकर बाधा डालने या रुकावट पैदा करने पर सजा का प्रावधान बताया गया है, जिसमें तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों शामिल हैं।

विरोध और समर्थन में तर्क

बिल का विरोध करने वाले संगठनों का कहना है कि देश में बेरोजगारी, महंगाई, आर्थिक चुनौतियां, किसानों की समस्या और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। वहीं, बिल के समर्थकों का कहना है कि यह कदम राष्ट्रीय गीत के सम्मान और संरक्षण के लिए उठाया गया है। अब सभी की नजर राष्ट्रपति की मंजूरी पर है। इसके बाद ही तय होगा कि यह विधेयक कानून के रूप में कब लागू होगा।

Author Desk

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