ममता की आस्था, लोकपरंपरा का रंग… हलषष्ठी पर गूंजा ‘संतान सुख’ का संकल्प

ममता की आस्था, लोकपरंपरा का रंग… हलषष्ठी पर गूंजा ‘संतान सुख’ का संकल्प
रायपुर। छत्तीसगढ़ की मिट्टी में रची-बसी लोकपरंपराओं का पर्व हलषष्ठी बुधवार को आस्था, ममता और पारंपरिक रीति-रिवाजों के रंग में सराबोर नजर आया। संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना लेकर माताओं ने दिनभर उपवास रखा। सुबह से ही मंदिरों और पूजा स्थलों पर महिलाओं की भीड़ जुटने लगी। हाथों में पूजा की थाली, सिर पर आंचल और मन में संतान की खुशहाली की कामना—पूरे माहौल में भक्ति और लोकसंस्कृति का अनूठा संगम दिखाई दिया।
पसहर चावल और छह भाजी ने सजाई पूजा की थाली
हलषष्ठी की पूजा में छत्तीसगढ़ की ग्रामीण परंपराओं की खास झलक देखने को मिली। व्रती महिलाओं ने पसहर चावल, छह प्रकार की भाजी और पारंपरिक पूजा सामग्री से पूजा-अर्चना की। इस पर्व की खासियत यह है कि इसमें खेत में हल चलाकर पैदा होने वाले अनाज और खाद्य पदार्थों से परहेज किया जाता है। इसके बजाय प्राकृतिक रूप से उगने वाली वनस्पतियों और पारंपरिक खाद्य सामग्री को पूजा और व्रत में शामिल किया जाता है।
भैंस के दूध-दही ने बढ़ाई बाजार की रौनक
पर्व के चलते बाजारों में भी हलषष्ठी की रंगत दिखाई दी। पूजा और व्रत में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की मांग बढ़ी तो खास तौर पर भैंस के दूध, दही और घी की खरीदारी के लिए लोगों की भीड़ नजर आई। मांग बढ़ने के साथ कीमतों में भी तेजी रही। बाजार में भैंस का दूध करीब 200 से 280 रुपए किलो, दही 160 रुपए किलो और घी करीब 2 हजार रुपए किलो तक बिका।
महुआ के पत्तल-दोने से लेकर काशी घास तक, हर चीज में दिखी परंपरा
ग्रामीण इलाकों में हलषष्ठी का रंग और भी गहरा नजर आया। पूजा के लिए महुआ के पत्तों से बने पत्तल-दोने और दातून का इस्तेमाल किया गया। पूजा स्थल पर मिट्टी का कुंड बनाकर उसे फूल-पत्तियों और काशी घास के फूलों से सजाया गया। इसके बाद कुंड में जल अर्पित कर माता हलषष्ठी की पूजा की गई। कई स्थानों पर महिलाओं ने एक साथ बैठकर व्रत कथा का श्रवण किया और पारंपरिक गीतों के बीच पर्व की रस्में पूरी कीं।
एक दिन का उपवास, संतान के लिए जीवनभर की दुआ
हलषष्ठी सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मां और संतान के बीच अटूट ममता का प्रतीक भी है। दिनभर अन्न-जल का त्याग कर माताएं अपनी संतान के दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना करती रहीं। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान बलराम और माता हलषष्ठी की आराधना से संतान को सुख-समृद्धि और आरोग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। कुल मिलाकर, हलषष्ठी पर छत्तीसगढ़ में आस्था के साथ अपनी जड़ों से जुड़ने की तस्वीर भी दिखाई दी—जहां पूजा की थाली में सिर्फ सामग्री नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही लोकपरंपराएं सजी नजर आईं।



