छत्तीसगढ़

स्थानीय उपेक्षा और ‘ठेकेदारी’ के चक्रव्यूह में फंसे सीमेंट संयंत्रों के श्रमिक, वर्षों से प्रमोशन और वेतन वृद्धि का इंतजार

स्थानीय उपेक्षा और ‘ठेकेदारी’ के चक्रव्यूह में फंसे सीमेंट संयंत्रों के श्रमिक, वर्षों से प्रमोशन और वेतन वृद्धि का इंतजार

 

 

बलौदाबाजार( प्रखर )। जिले में स्थापित देश-विदेश के बड़े और अंतरराष्ट्रीय सीमेंट संयंत्रों में इन दिनों स्थानीय श्रमिकों का असंतोष चरम पर है। लंबे समय से ईमानदारी और निष्ठा के साथ फैक्ट्रियों में अपना पसीना बहा रहे श्रमिकों को न तो समय पर वेतन वृद्धि (इंक्रीमेंट) मिल रही है और न ही उनकी पदोन्नति (प्रमोशन) हो रही है। जिले की धरा पर करोड़ों-अरबों का मुनाफा कमाने वाले इन औद्योगिक घरानों में आखिर चल क्या रहा है, यह आज एक बड़ा सुलगता हुआ सवाल बन चुका है।

 

बहारों को ‘पलकों पर बिठाया’, रावन सहित प्रभावित गांवों को ‘ठेकेदारी’ का थमाया झुनझुना

 

संयंत्रों की कार्यप्रणाली पर नजर डालें तो एक बेहद पक्षपातपूर्ण रवैया सामने आता है। विशेष रूप से औद्योगिक क्षेत्र से घिरे हिरमी, ढाबाडीह – खजुरी, रावन, रवान , रिसदा, खपराडीह, भरूवाडीह, रिंगनी, केसदा, कामता और सोनाडीह जैसे गांवों के युवाओं और अनुभवी श्रमिकों का आरोप है कि उच्च पदों, नियमित नौकरियों और बेहतर पैकेजों पर बाहर से आने वाले लोगों (बाहरी राज्यों के कर्मियों) को प्राथमिकता दी जा रही है।

इसके विपरीत, जिन स्थानीय भू-विस्थापितों और इन प्रभावित गांवों के ग्रामीणों ने अपनी उपजाऊ जमीनें देकर इन उद्योगों की नींव रखी, उन्हें केवल ठेकेदारी प्रथा (Contract Labor) के तहत झोंक दिया गया है। वर्षों की सेवा के बाद भी इन्हें नियमित (परमानेंट) करने के बजाय न्यूनतम मजदूरी पर काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

 

सुविधाओं के नाम पर ‘न्यूनतम वेतन’, जिम्मेदार मौन

 

हिरमी, ढाबाडीह- खजूरी, रावन, रिसदा, खपराडीह और सोनाडीह सहित आसपास के क्षेत्रों में लंबे समय से कार्य कर रहे कुशल श्रमिक भी आज खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। महंगाई के इस दौर में जहां हर चीज के दाम आसमान छू रहे हैं, वहीं इन अंतरराष्ट्रीय सीमेंट संयंत्रों में काम करने वाले स्थानीय मजदूरों का वेतन जस का तस बना हुआ है। श्रम नियमों को ताक पर रखकर कई जगहों पर न्यूनतम वेतन अधिनियम का भी ठीक से पालन नहीं होने की शिकायतें आ रही हैं। वेतन वृद्धि और पदोन्नति की मांग करने पर श्रमिकों को नौकरी से निकालने या डराने-धमकाने का खेल पर्दे के पीछे चल रहा है।

 

सुलगते सवाल:

 

1. सीएसआर और स्थानीय रोजगार का वादा कहां गया? फैक्ट्री स्थापना के समय रावन, भरूवाडीह, रिंगनी, केसदा और कामता जैसे गांवों के लोगों को शत-प्रतिशत रोजगार और तरक्की देने के बड़े-बड़े दावे आज खोखले साबित क्यों हो रहे हैं?

2. श्रम विभाग क्यों है मौन? आखिर जिले का जिम्मेदार श्रम विभाग और प्रशासन इन संयंत्रों के भीतर चल रही मनमानी और स्थानीय युवाओं के शोषण पर आंखें मूंदकर क्यों बैठा है?

3. समान कार्य, असमान वेतन क्यों? एक ही प्रकृति के कार्य के लिए बाहरी और परमानेंट स्टाफ को भारी-भरकम पैकेज और स्थानीय ठेका मजदूरों को मामूली वेतन क्यों दिया जा रहा है?

 

आक्रोश की सुलग रही चिंगारी

 

इन प्रभावित गांवों के स्थानीय श्रमिकों और श्रमिक संगठनों का कहना है कि यदि प्रबंधन ने अपना रवैया नहीं बदला, बाहरी लोगों को तरजीह देना बंद नहीं किया और स्थानीय पुराने श्रमिकों को उचित वेतन वृद्धि व पदोन्नति नहीं दी, तो आने वाले दिनों में यह शांतिपूर्ण असंतोष एक बड़े जन-आंदोलन और औद्योगिक अशांति का रूप ले सकता है। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन और औद्योगिक प्रबंधन इस गंभीर मामले पर क्या कदम उठाते हैं।

 

बलौदा बाजार से ब्यूरो प्रमुख राजेश्वर गिरी की रिपोर्ट

Author Desk

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