अपनी जिम्मेदारियों से वह मुक्त होना चाहता है, जिसने अपना आत्मविश्वास खो दिया है : साध्वी शुभंकरा श्रीजी

रायपुर। अगर हम पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने आप को परमात्मा को समर्पित कर देंगे तो हम निर्वाण तक सुख भोगेंगे। एक जटिल और अनुभवी व्यक्ति भी एक समय के बाद अपना आत्मविश्वास खो देता है। वह सोचने को मजबूर हो जाता है कि कब तक वह अपने परिवार का बोझ उठाता रहेगा। फिर वह अपने इस कार्यभार से मुक्त होना चाहता है। यह बातें एमजी रोड स्थित जैन दादाबाड़ी प्रांगण में चल रहे मनोहरमय चातुर्मास 2023 की प्रवचन श्रृंखला के दौरान नवकार जपेश्वरी साध्वी शुभंकरा श्रीजी ने कही।
साध्वीजी कहती हैं कि सूर्याेदय से पूर्व जागने की आदत डालिए। सुबह जल्दी जागने वाले महानुभाव उगते हुए भाग्य के सूर्य का दर्शन करते हैं, जबकि विलम्ब से उठने वाले हमेशा डूबते हुए सूरज का ही दीदार करते हैं। सुबह 5.30 बजे उठना और रात को 10.30 बजे सोना आरोग्य, बुद्धि, धनार्जन और भाग्योदय के लिए पहला सार्थक कदम है। सुबह उठते ही निवृत्ति के लिए अवश्य जाएं, ताकि शरीर के मलीन तत्व का विसर्जन होने से शरीर स्वच्छ और निर्मल हो सके। आप सूर्याेदय से पूर्व स्नान करें। अल सुबह किया गया स्नान ब्रह्मस्नान है, सूर्याेदय के बाद किया गया स्नान मानव-स्नान है, दोपहर में किया गया स्नान आलसियों का पशु-स्नान है। प्रतिदिन एक घंटा स्वास्थ्य के लिए प्रदान कीजिए। शारीरिक स्फूर्ति के लिए 20 मिनट गति के साथ टहलिए। प्राण-ऊर्जा बढ़ाने के लिए 20 मिनट योग और प्राणायाम का अभ्यास कीजिए और मानसिक शांति तथा आध्यात्मिक चेतना के विकास के लिए 20 मिनट ध्यान कीजिए। आप खुद के लिए अगर एक घंटा निकाल लेंगे तो यकीन मानिए, आप कुछ ही दिनों में ऊर्जावान बन जाएंगे।
उन्होंने आगे कहा कि प्रतिदिन सुबह उठकर माता-पिता के चरण स्पर्श अवश्य कीजिए। उनके आशीर्वाद की बदौलत आपका पूरा दिन सुकून भरा बीतेगा। दिनभर में जो-जो कार्य निपटाने हैं, उनकी सूची सुबह ही तैयार कर लीजिए। व्यवस्थित ढंग से दिन की शुरुआत करने वाले एक दिन में 7 दिनों का काम निपटा लिया करते हैं। घर से बाहर निकलते समय अपने घरवालों को कहकर जाइए। ऐसा करने से उनकी सद्भावना का रक्षा-कवच आपकी रक्षा करता रहेगा और जरूरत पड़ने पर वे भी आपसे सम्पर्क कर सकेंगे।
उन्होंने कहा कि भोजन करने से पहले हाथों को धोने की आदत डालिए, ताकि हाथों का मैल और पसीना भोजन के जरिए पेट में जाकर रोग का कारण न बने। भोजन सदा ताजा और सात्विक लीजिए। बासी भोजन रोग और आलस्य को बढ़ाने वाला होता है। सात्विक, सीमित और ऋतु के अनुकूल भोजन करने वाला अपना चिकित्सक आप होता है। शादी-विवाह और जीमण के भोजन को संयमित रूप में लीजिए, क्योंकि वह भोजन राजसिक और गरिष्ठ होने के कारण सुपाच्य नहीं होता। सात्विक और संयमित भोजन लेने से शरीर, मन और प्राण, तीनों ही शुद्ध-सात्विक रहते हैं।



