धन की संपन्नता अहंकार देती है और मन की संपन्नता संस्कार : साध्वी शुभंकरा श्रीजी

रायपुर। एमजी रोड स्थित जैन दादाबाड़ी प्रांगण में चल रहे मनोहरमय चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला में नवकार जपेश्वरी साध्वी शुभंकरा श्रीजी ने कहा कि धन की संपन्नता अहंकार दे सकती है लेकिन मन की संपन्नता संस्कार देती है। दोनों में संपन्नता है, धन संपन्नता दे सकता है लेकिन अगर मन समृद्धशाली है तो व्यक्ति का जीवन बहुत ही खुशहाल हो जाता है। धन की संपन्नता के लिए मेहनत करना पड़ता है, जबकि मन की संपन्नता स्वफूर्त है। धन से प्राप्त होने वाले भौतिक सुखों के लिए मन को टटोलना पड़ता है और जब मन की संपन्नता बढ़ने लगती है तो जीवन का क्रमिक विकास होने लगता है। मन की संपन्नता हमें मंजिल तक पहुंचा देती है।
साध्वीजी कहती है कि हम बात कर रहे थे, जैसा भाव वैसा प्रभाव। जीव ने पिछले भव में जो कर्म किये है उसके अनुसार आज हमें यह रंग-रूप, कद-काठी, परिवार-समाज मिला है, हम यह सब जानते है। वैसे ही आने वाले भव की तैयारी हमें अभी से करनी है। जब आपको विदेश जाने का मन हो तो आप पैसे जोड़कर प्लानिंग करते हो। यदि आपके पास वीसा-पासपोर्ट सब हो और पैसे नहीं हो तो आप कैसे जाओगे, यह तो लाखों रूपयों का खर्च है। वैसे ही मन की संपन्नता ही हमारे अगले भव की टिकट है। चिड़ियाघर में अनेक प्रकार के जानवर होते है, आप उन्हें देखने दूसरे शहर जाते हो तो आने जाने और वहां ठहरने में ही हजारों रूपये खर्च हो जाते है। वहीं, जब आप जंगल सफारी जाते हो तो वहां जानवरों के दिखने की गारंटी नहीं होती है लेकिन अगर शेर-चीता आपके सामने आ जाए तो उससे सुरक्षा के लिए सारी व्यवस्थाएं होती है। वैसे ही हमें अपने आने वाले भव का रिजर्वेशन अभी से करके रखना है। हमें संभलकर रहना है क्योंकि हमें यह भी नहीं पता कि हमें जीना कब तक है। पता नहीं कब कौन सी सांस आखिरी हो। हमें निश्चिंत होना है, सावधान रहना है क्योंकि सब कुछ अपने समय पर होगा और अच्छा ही होगा।
साध्वीजी कहती है कि आजकल लोग मंदिर भी अपने समय से आते-जाते हैं क्योंकि रुचि नहीं है बस फॉर्मेलिटी रह गई है। जबकि आप ऑफिस या दुकान जाते समय ऐसा नहीं करते हो। आज भाव धर्म की रूचि किसी में नहीं है। बड़े लोग भी दान करने के समय सोचते हैं। मोक्ष का रास्ता आसान करना है तो स्वाध्याय को जीवन में प्राण बना लो। ज्ञान का लक्ष्य रखो, एक बार ज्ञान का रस लग गया, मजा आ गया तो सभी इंद्रियां जीत लोगे और मोक्ष भी हाथ में ही दिखने लगेगा। आज आपको माता पिता के प्रति, समाज के प्रति, संतान के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाना है। संसार के प्रति आदर भाव रखना है उदासीन हृदय से भी आपको पाप नहीं करना है, जिस दिन पाप आपको पाप लगेगा उस दिन फिर भी आप बच जाओगे। जबकि आज तो वर्षों से लोग स्वाध्याय कर रहे हैं फिर भी उन्हें पाप और पुण्य में फर्क समझ नहीं आ रहा है।



