मृत्यु के बाद वैसे भी हम शांत हो जाएंगे, तो जीते-जी क्यों किसी पर पत्थर बरसाना : साध्वी शुभंकरा श्रीजी

रायपुर। एमजी रोड स्थित जैन दादाबाड़ी प्रांगण में चल रहे मनोहरमय चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला में रविवार को नवकार जपेश्वरी साध्वी शुभंकरा श्रीजी ने घर को स्वर्ग कैसे बनाएं विषय पर कहा कि जो इस संसार में आता है, उसे एक दिन यह दुनिया छोड़कर जाना ही पड़ता है। हम इस दुनिया में रहकर एक मुकाम तक पहुंचना चाहते हैं, नाम कमाकर बड़ा बनना चाहते हैं, पर उससे फायदा क्या होगा। आपका अस्तित्व तो इस दुनिया से खत्म होना ही है, आज या कल यह तो किसी को नहीं पता लेकिन यह जरूर पता है कि एक दिन तो जाना ही है।
आज हम अपना वजूद कायम करने के लिए दूसरों पर जुल्म ढोते है। सांसारिक सुख सुविधाओं का भोग करने के लिए आज हम कितने लोगों का शोषण करते हैं। बुरा-भला कहकर अपना काम निकलवा लेते हैं। साम, दाम, दंड और भेद के बाद भी काम नहीं बने तो लोग आज किसी की भावनाओं से भी खेल लते है। आज अखबारों में ऐसी खबरे रोज पढ़ने को मिलती है, किसी ने किसी के साथ धोखा किया, जज्बातों से खेला, झांसा देकर रूपये ले लिए जैसे कई घटना देखे जा सकते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा करके उन्हें क्या मिलता होगा। क्रोध में आकर भावनात्मक होकर द्वेष में आकर आज लोग बदले की भावना रखते है। आज हम केवल सुनते ही है कि फला ने फला के साथ छल-कपट किया, विश्वासघात किया। ऐसा कर उन्हें कुछ पलों के लिए मन की शांति जरूर मिल जाती है, पर कुछ समय बाद उन्हें अपने किए पर प्रायशिचित होता है। यह तो अब पछताए तो होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत वाली हो जाती है। आवेश में आकर आपने किसी को चोट पहुंचाई, किसी की भावनाओं को आहत किया तो आज उसकी सजा उसे जेल जाकर भुगतनी पड़ती है, नहीं तो व्यक्ति कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाता रहता है।
साध्वीजी कहती है कि बोलो मगर प्यार से, देखो मगर प्रेम से। उन्होंने आगे कहा कि आज आपको किसी को सुधारना है तो उसे आप सीधे-सीधे कुछ मत कहिए। आप सीधे सीधे किसी से कुछ कह देंगे तो वह आपके शब्दों का उल्टा मतलब निकालेगा। आपको किसी पर पत्थर भी मारना पड़े तो उसे वह फूल की तरह लगाना चाहिए। कहने का अर्थ यह है कि आप किसी को कुछ सिखाना चाहते हैं तो उसे उसी की भाषा में प्यार से समझाएं। ऐसा करने से वह बात भी समझ जाएगा और हो सकता है कि आपके द्वारा कहे गए शब्दों या वाक्यों से उसका कल्याण हो जाए। हम बात कर रहे थे कि हम मृत्यु के बाद शांत हो जाएंगे तो हम आज जीते जी क्यो किसी से बैर लें। अपने मुंह से अपना गुणगान करने वाले कभी समय पर काम नही आते हैं। आपको अपने गुणों की सराहना नहीं करनी चाहिए। गुणों को कहकर नहीं, कर्म द्वारा प्रतिपादित कर दिखाए। कहने को तो आप क्या नहीं कर सकते. आप हिमालय पर्वत भी आसानी से फतेह कर सकते हो, आप समुंदर की गहराई को छूकर आ सकते हो, आप दुनिया को जीत सकते हो पर यह सारे कार्य कहने जितने आसान नहीं है। आप इस ओर एक कदम आगे बढ़ाएंगे तो आपको अपनी क्षमताओं का एहसास हो जाएगा।



