‘शरिया कानून से कोई समझौता नहीं’ मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण नहीं कर सकते : मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

‘शरिया कानून से कोई समझौता नहीं’ मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण नहीं कर सकते : मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड
नई दिल्ली। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा है कि समान या धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता मुसलमानों को मंजूर नहीं है क्योंकि वे शरिया कानून (मुस्लिम पर्सनल लॉ) से कभी समझौता नहीं करेंगे। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है, “ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री द्वारा सेक्यूलर सिविल कोड के आह्वान और पर्सनल लॉ को सांप्रदायिक कहना अत्यधिक आपत्तिजनक मानता है।” बोर्ड ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यह मुसलमानों को अस्वीकार्य है क्योंकि वे शरिया कानून (मुस्लिम पर्सनल लॉ) से कभी समझौता नहीं करेंगे।
सेक्यूलर सिविल कोड सोची समझी साजिश
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता डॉ. एसक्यूआर इलियास ने प्रेस विज्ञप्ति में धर्म के आधार पर व्यक्तिगत कानूनों को सांप्रदायिक बताने और उनकी जगह सेक्यूलर सिविल कोड की प्रधानमंत्री की घोषणा पर आश्चर्य जताया। उन्होंने इसे एक सोची-समझी साजिश बताया और कहा कि इसके गंभीर परिणाम होंगे। बोर्ड ने इस बात का उल्लेख करना महत्वपूर्ण समझा कि भारत के मुसलमानों ने कई बार यह स्पष्ट किया है कि उनके पारिवारिक कानून शरिया पर आधारित हैं, जिससे कोई भी मुसलमान किसी भी कीमत पर विचलित नहीं हो सकता है। देश के विधानमंडल ने स्वयं शरिया आवेदन अधिनियम, 1937 को मंजूरी दी है और भारत के संविधान ने अनुच्छेद 25 के तहत धर्म को मानने, उसका प्रचार करने और उसका पालन करने को मौलिक अधिकार घोषित किया है।
मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण नहीं कर सकते
विज्ञप्ति के अनुसार, “उन्होंने कहा कि अन्य समुदायों के पारिवारिक कानून भी उनकी अपनी धार्मिक और प्राचीन परंपराओं पर आधारित हैं। इसलिए, उनके साथ छेड़छाड़ करना और सभी के लिए धर्मनिरपेक्ष कानून बनाने की कोशिश करना मूल रूप से धर्म का खंडन और पश्चिम की नकल है।” उन्होंने आगे बताया कि देश के निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा ऐसी निरंकुश शक्तियों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। विज्ञप्ति के अनुसार, “उन्होंने याद दिलाया कि संविधान के अध्याय IV के अंतर्गत नीति निर्देशक सिद्धांतों में उल्लिखित समान नागरिक संहिता मात्र एक निर्देश है तथा इस अध्याय के सभी निर्देश न तो अनिवार्य हैं और न ही उन्हें न्यायालय द्वारा लागू किया जा सकता है। ये नीति निर्देशक सिद्धांत संविधान के अध्याय III के अंतर्गत निहित मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण नहीं कर सकते।”
गुमराह करने की हो रही कोशिश
उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि हमारा संविधान एक संघीय राजनीतिक संरचना तथा बहुलवादी समाज की परिकल्पना करता है, जहां धार्मिक संप्रदायों तथा सांस्कृतिक इकाइयों को अपने धर्म का पालन करने तथा अपनी संस्कृति को बनाए रखने का अधिकार है। विज्ञप्ति में कहा गया, “बोर्ड के प्रवक्ता डॉ. इलियास ने प्रधानमंत्री द्वारा संवैधानिक शब्द समान नागरिक संहिता के स्थान पर सेक्यूलर सिविल कोड के प्रयोग की जोरदार आलोचना की, जो जानबूझकर तथा भ्रामक है।” उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री जानबूझकर राष्ट्र को गुमराह कर रहे हैं तथा कहा कि समान का अर्थ है कि यह पूरे देश तथा सभी धार्मिक तथा गैर-धार्मिक लोगों पर लागू होगा। जाहिर है, इसमें किसी भी वर्ग या जाति, यहां तक कि आदिवासियों को भी बाहर रखने की कोई गुंजाइश नहीं होगी।



